पश्चिम बंगाल में मिली हार, समीक्षा बैठक और 'दीदी' के एक फैसले पर बगावत...टूट सकती है ममता बनर्जी की पार्टी TMC, जानिए क्यों नाराज हैं सांसद
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदरखाने एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदरखाने एक नया तूफान उठ खड़ा हुआ है। विवाद की चिंगारी ममता बनर्जी के एक फैसले से भड़की है और वो है लोकसभा में पार्टी का ‘चीफ व्हिप’ फिर से कल्याण बनर्जी को बनाया जाना। इस फैसले पर कई महिला सांसदों ने तीखा विरोध जताया है। इस झगड़े ने पार्टी के अंदर गहरे फूट की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास पर हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई थी, लेकिन चर्चा जल्दी ही कल्याण बनर्जी की पुनर्नियुक्ति पर केंद्रित हो गई। बैठक में कई प्रमुख सांसदों के न आने की खबरें राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में रहीं। देव (दीपक अधिकारी), रचना बनर्जी, कोयल मल्लिक, बाबुल सुप्रियो और अरूप चक्रवर्ती जैसे नेता बैठक में अनुपस्थित रहे। पार्टी का कहना है कि कुछ नेताओं ने पहले से अनुपस्थिति की सूचना दी थी, लेकिन विरोधी गुट इसे नेतृत्व के प्रति नाराज़गी का संकेत बता रहे हैं।
महिला सांसदों का कठोर रुख
पार्टी की महिला सांसदों में कल्याण बनर्जी के खिलाफ असंतोष स्पष्ट रूप से उभर रहा है। कई महिला सांसदों ने बताया है कि वे कल्याण के नेतृत्व में काम करने में असहज महसूस करती हैं और उनका व्यवहार कई बार अपमानजनक रहा है। इस नाराजगी का कारण पुराने व्यक्तिगत विवाद भी माना जा रहा है, जिसकी गूंज अब फिर से जोर पकड़ रही है।
महुआ Vs कल्याण: पुराना मामला फिर एक्टिव
महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी के बीच पिछले साल हुई सार्वजनिक तनातनी को कई लोग इसी तनाव की जड़ मान रहे हैं। तब महुआ ने कल्याण पर कड़े शब्दों में आरोप लगाए थे और विवाद के बाद कल्याण को पद छोड़ना पड़ा था। अब उनकी वापसी ने उस पुरानी खटास को दोबारा हवा दे दी है, जिससे स्थिति और जटिल हुई है।
हार की वजहों की जांच और नई कमेटियाँ
बैठक में मौजूद कुछ वरिष्ठ नेता जैसे अभिषेक बनर्जी, सुदीप बनर्जी और डेरेक ओ’ब्रायन ने हार के कारणों का विश्लेषण करने पर जोर दिया। पार्टी ने तीन कमेटियां गठित की हैं जिनका नेतृत्व समीरुल इस्लाम, डोला सेन और प्रसून मुखर्जी संभालेंगे। इन टीमों को जमीन पर रिपोर्ट तैयार कर के बताना होगा कि चुनावी हार क्यों हुई और कार्यकर्ता किस तरह यूपी और बंगाल में भरोसा खो बैठे।
जवान चेहरों और पुरानी वफादारी के बीच दरार
विश्लेषकों का कहना है कि यदि ममता समय रहते गुटबाज़ी पर काबू नहीं पातीं तो टीएमसी बिखराव की कगार पर पहुंच सकती है। लोकसभा में कुछ सांसद अलग राह अपनाने पर भी विचार कर रहे हैं। पार्टी के भीतर वफादार पुराने नेताओं और बदलाव चाहने वाले नए चेहरे के बीच मतभेद साफ दिख रहे हैं।
आगे क्या होगा — संसद में चुनौती
संसद सत्र के शुरू होने के साथ ही चीफ व्हिप की भूमिका और अहम हो जाएगी। अगर सांसद अपने व्हिप के निर्देश नहीं मानते तो टीएमसी की संसद में भूमिका कमजोर और विवादित नजर आ सकती है। ममता के लिए अब चुनौती दोगुनी है: बंगाल में खोई जमीन वापस जीतना और अपने ही दल को एकजुट रखना। आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि टीएमसी इस आंतरिक संकट से उबर पाती है या पार्टी और अधिक टूटती है।
Published By : Ankur Shrivastava
पब्लिश्ड 15 May 2026 at 12:41 IST